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Tuesday, 10 December 2013

आपस में फुट जगत की लुट

बेलो की नासमझी
बहुत समय की बात है, जंगल में चार बेल रहते थे | उनका आपस में बहुत प्रेम था | वे आपस में घूमते, साथ खाते पीते और कभी भी झगड़ा नहीं करते थे | उसी जंगल में शेर भी रहता था | बेलो को देखकर वह उन्हें खाने के लिए नए नए उपाय करता, ताकि वह उन्हें खा सके | पर उन चारो को एक साथ देख कर निराश हो जाता था |
और एक दिन उसने चारो बेलो को लड़ाने का उपाय सोच लिया | वह उन चारो बेलो के पास जाकर इधर-उधर घुमने लगा | बेल उसे अपने इतने पास घूमता देखकर डर गए | घबराहट के कारण वे एक दुसरे से अलग हो गए | बस शेर को तो इसी मोके की तलाश में था | वह बारी-बारी से एक-एक बेल के पास गया और उनके कान में कुछ कहा – "कुछ नहीं" और फिर वहा से चला गया और दूर कही पेड़ के पीछे छिप गया | अब क्या था चारो बेल यह जानने को उसुक्त थे की शेर ने उनके कान में क्या कहा |
चारो बेलो ने एक दुसरे को एक ही उतर दिया – कुछ नहीं कहा | अब सभी बेलो के दिमाग में एक ही बात चल रही थी की कही यह उससे मिल न गया हो और हमसे शेर की बात छिपा रहा हो | इसी बात को लेकर चारो बेलो में लड़ाई हो गई और अलग – अलग हो गए | और सबने अपनी दोस्ती भी तोड़ दी और अलग-अलग जंगल में घुमने लगे |
अपनी तरकीब को सफल देख कर शेर बहुत खुश हो गया | इस प्रकार उसने चारो को बारी-बारी में मारकर खा लिया|
सीख: आपस में फुट जगत की लुट 

*"This is called Self Appraisal"

एक छोटा बच्चा एक बड़ी दुकान पर लगे टेलीफोन बूथ पर जाता हैं और मालिक से छुट्टे पैसे लेकर एक नंबर डायल करता हैं|

दुकान का मालिक उस लड़के को ध्यान से देखते हुए उसकी बातचीत पर ध्यान देता हैं

लड़का- मैडम क्या आप मुझे अपने बगीचे की साफ़ सफाई का काम देंगी?

औरत- (दूसरी तरफ से) नहीं, मैंने एक दुसरे लड़के को अपने बगीचे
का काम देखने के लिए रख लिया हैं|

लड़का- मैडम मैं आपके बगीचे का काम उस लड़के से आधे वेतन में करने
को तैयार हूँ!

औरत- मगर जो लड़का मेरे बगीचे का काम कर रहा हैं उससे मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ|

लड़का- ( और ज्यादा विनती करते हुए) मैडम मैं आपके घर की सफाई भी फ्री में कर दिया करूँगा!!

औरत- माफ़ करना मुझे फिर भी जरुरत नहीं हैं धन्यवाद|
लड़के के चेहरे पर एक मुस्कान उभरी और उसने फोन का रिसीवर रख दिया|

दुकान का मालिक जो छोटे लड़के की बात बहुत ध्यान से सुन रहा था वह लड़के के पास आया और बोला- " बेटा मैं तुम्हारी लगन और व्यवहार से बहुत खुश हूँ,

मैं तुम्हे अपने स्टोर में नौकरी दे सकता हूँ"
लड़का- नहीं सर मुझे जॉब की जरुरत नहीं हैं आपका धन्यवाद|

दुकान मालिक- (आश्चर्य से) अरे अभी तो तुम उस लेडी से जॉब के लिए इतनी विनती कर रहे थे !!

लड़का- नहीं सर, मैं अपना काम ठीक से कर रहा हूँ की नहीं बस मैं ये चेक कर रहा था, मैं जिससे बात कर रहा था, उन्ही के यहाँ पर जॉब करता हूँ|

*"This is called Self Appraisal"

"आप अपना बेहतर दीजिये, फिर देखिये
सारी दुनिया आपकी प्रशंसा करेगी..

समझदार बंदर


बहुत पुरानी बात है | किसी जंगल में एक बंदर रहता था | वह बहुत समझदार व् चतुर था | वह एक पेड़ से दुसरे पेड़ पर उछलता – कूदता रहता था | इस खेल में उसे बहुत अच्छा लगता था | एक बार वह जंगल घुमने निकला| घूमते हुए उसे जंगल में एक थेला मिला | थेले में एक कंधा और एक शीशा था | उसने कंधा उठाया और उसे उलट-पलटकर देखने लगा | पर उसे कुछ समझ नहीं आया, इसलिए बेकार समझकर उसने कंधा फ़ेंक दिया |
इसके बाद उसने शीशा उठाया | उसे भी उलट-पलटकर देखने लगा पर तब भी उसे कुछ समझ नहीं आया पर अचानक उसे शीशे में अपना चेहरा देख कर उसे समझ आ गया की जो भी उसके सामने आयगा इसमें दिखाई देगा | फिर उसने सोचा की इसका में क्या करू? कुछ देर सोचने के बाद उसने वह शीशा वापस थेले में डाल दिया और आगे चल पड़ा | पर अब उसी चाल कुछ बदली हुई थी | रास्ते में उसे भालू मिला | वह बोला –"अरे ओ बंदर, इतना अकडकर क्यों चल रहा है ?" भालू की बात सुन बंदर बोला – "में तो ऐसे ही अकडकर चलूगा | तू क्या कर लेगा मेरा? तेरे जैसो को तो में अपने थेले में रखता हु |"
उसी समय जंगल का राजा शेर भी वहा आ गया | शेर ने भालू से पूछा – "तुम दोनों क्यों लड़ रहे हो?" भालू ने शेर के सामने हाथ जोडकर कहा – महाराज ! यह बंदर अकड रहा है | भालू की बात सुनकर शेर ने बंदर अकड़कर पूछा – "अरे ओ बंदर | क्या यह सच है ?" बंदर ने शेर से भी अकड़ते हुए कहा – "क्यों न अकडू | में सबसे ताकतवर हु |"
बंदर की बात सुनते ही शेर को गुस्सा आ गया और दहाड़ते हुए बोला – भाग जा यहाँ से, अगर एक पंजा मर दिया तो यही पर मर जायगा |" बंदर ने शेर से भी व्ही बात कही –" तू मुझे मरेगा? तेरे जैसे को तो में अपने थेले में रखता हु |"
बंदर की निडरता देख शेर थोडा नर्म होकर बोला – "अच्छा में भी तो देखू | निकल मेरे जैसा शेर अपने थेले में से|" फिर क्या, बंदर ने अपना थेला खोला और शीशा निकला और शेर के मुंह के सामने कर दिया | शेर ने उसमे अपना चेहरा देखा पर समझा की इसमें कोई दूसरा शेर है | यह देख कर वह डर गया और उसने सोचा – " यह बंदर तो सचमुच बड़ा ताकतवर है | इससे लड़ना ठीक नहीं |
शेर ने बंदर से हाथ जोड़ते हुए कहा – बंदर जी | आपसे मेरा क्या झगड़ा? आप जो चाहे, करे |" शेर की बात सुन भालू भी बंदर से डर गया | अब तो बंदर और अधिक निडर होकर बड़े मजे से जंगल में रहने लगा |
सीख: समझदारी का फल सदेव अच्छा होता है 

Monday, 9 December 2013

आज ही क्यों नहीं ?

एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था |गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे लेकिन  वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था |सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश  करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था | अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य जीवन-संग्राम में पराजित न हो जाये|आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है |ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है| वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है,तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता| यहाँ तक कि  अपने पर्यावरण के प्रति  भी सजग नहीं रहता है और न भाग्य द्वारा प्रदत्त सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही प्रवीण हो पता है | उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली |एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा –'मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, दो दिन के लिए दे कर, कहीं दूसरे गाँव जा रहा हूँ| जिस भी लोहे की वस्तु को तुम इससे स्पर्श करोगे, वह स्वर्ण में परिवर्तित हो जायेगी| पर याद रहे कि दूसरे दिन सूर्यास्त के पश्चात मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा|'
 
 शिष्य इस सुअवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा स्वर्ण होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी,समृद्ध और संतुष्ट रहेगा, इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी नहीं उठाना पड़ेगा | फिर दूसरे दिन जब वह  प्रातःकाल जागा,उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है |उसने मन में पक्का विचार किया कि आज वह गुरूजी द्वारा दिए गये काले पत्थर का लाभ ज़रूर उठाएगा | उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें स्वर्ण में परिवर्तित कर देगा. दिन बीतता गया, पर वह इसी सोच में बैठा रहा की अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान लेता आएगा. उसने सोचा कि अब तो  दोपहर का भोजन करने के पश्चात ही सामान लेने निकलूंगा.पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी , और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा. पर आलस्य से परिपूर्ण उसका शरीर नीद की गहराइयों में खो गया, और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था. अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया | पर इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी: उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया 

बाज की उड़ान

एक बार की बात है कि एक बाज का अंडा मुर्गी के अण्डों के बीच आ गया. कुछ दिनों  बाद उन अण्डों में से चूजे निकले, बाज का बच्चा भी उनमे से एक था.वो उन्ही के बीच बड़ा होने लगा. वो वही करता जो बाकी चूजे करते, मिटटी में इधर-उधर खेलता, दाना चुगता और दिन भर उन्हीकी तरह चूँ-चूँ करता. बाकी चूजों की तरह वो भी बस थोडा सा ही ऊपर उड़ पाता , और पंख फड़-फडाते हुए नीचे आ जाता . फिर एक दिन उसने एक बाज को खुले आकाश में उड़ते हुए देखा, बाज बड़े शान से बेधड़क उड़ रहा था. तब उसने बाकी चूजों से पूछा, कि-
" इतनी उचाई पर उड़ने वाला वो शानदार पक्षी कौन है?"
 
तब चूजों ने कहा-" अरे वो बाज है, पक्षियों का राजा, वो बहुत ही ताकतवर और विशाल है , लेकिन तुम उसकी तरह नहीं उड़ सकते क्योंकि तुम तो एक चूजे हो!"
 
बाज के बच्चे ने इसे सच मान लिया और कभी वैसा बनने की कोशिश नहीं की. वो ज़िन्दगी भर चूजों की तरह रहा, और एक दिन बिना अपनी असली ताकत पहचाने ही मर गया.
 दोस्तों , हममें से बहुत से लोग  उस बाज की तरह ही अपना असली potential जाने बिना एक second-class ज़िन्दगी जीते रहते हैं, हमारे आस-पास की mediocrity हमें भी mediocre बना देती है.हम में ये भूल जाते हैं कि हम आपार संभावनाओं से पूर्ण एक प्राणी हैं. हमारे लिए इस जग में कुछ भी असंभव नहीं है,पर फिर भी बस एक औसत जीवन जी के हम इतने बड़े मौके को गँवा देते हैं.
 
आप चूजों  की तरह मत बनिए , अपने आप पर ,अपनी काबिलियत पर भरोसा कीजिए. आप चाहे जहाँ हों, जिस परिवेश में हों, अपनी क्षमताओं को पहचानिए और आकाश की ऊँचाइयों पर उड़ कर  दिखाइए  क्योंकि यही आपकी वास्तविकता है.