लिखिए अपनी भाषा में

Tuesday, 30 July 2013

एक कोड से तेज बनाइये अपना ब्लॉग


अगर आपका ब्लॉग थोड़ी देर से खुलता है या आप चाहते हैं कि धीमें इंटरनेट कनेक्शन में भी आपका ब्लॉग तेजी से खुले और आपके पाठक ज्यादा इंतज़ार ना करें तो एक HTML कोड के जरिये आप अपने ब्लॉग को तेज बना सकते हैं ।

ये कोड हैं PHP Flush Function, इसे अपने ब्लॉग के HTML कोड में जोड़ देने पर ये आपके ब्लॉग के आंशिक रूप से तैयार कोड्स को भी ब्राउजर के लिए तैयार कर देता हैं ।

इसे अपने ब्लॉग में लगाने के लिए आपको अपने ब्लॉग के HTML कोड में थोडा बदलाव करना होगा इसलिए ये प्रक्रिया बड़ी ही सावधानी के साथ करें ।

अपने ब्लॉगर अकाउंट में लोगिन करें dashboard से Design > Edit HTML पर जाएँ

ये जरुरी है कि आप अपने वर्तमान ब्लॉग को सुरक्षित कर लें ताकि अगर आपको भविष्य में कोई कठिनाई हो तो आपका ब्लॉग टेम्पलेट सुरक्षित रहे , ब्लॉग का बैक अप् लेने के लिए dashboard से Design > Edit HTML पर जाएँ"download full theme" पर क्लिक करें और ब्लॉग के टेम्पलेट को अपने कंप्यूटर पर सेव कर लें ।

अब Expand Widget Templates विकल्प पर क्लिक करें

Edit HTML पर </head> कोड ढूंढें इसके लिए आप Ctrl+F Key का भी प्रयोग कर सकते हैं ।

अब इसके ठीक नीचे

<?php flush(); ?>

ये कोड पेस्ट कर दें ।

अब आपका कोड कुछ इस तरह दिखाई देगा

</head>
<?php flush(); ?>
<body>

अब Preview पर क्लिक कर देख लें की सब ठीक है फिर सेटिंग को सेव कर दें ।

अब आपका ब्लॉग थोडा तेज हो जायेगा ।

अगर आप जानना चाहें कि कोड लगाने से पहले और बाद में वेबपेज लोड होने के समय में कितना फर्क आया है तो कोड लगाने से पहले
इस वेबसाइट
पर जाकर पहले अपने ब्लॉग का पता टाइप या पेस्ट कीजिये और Check बटन पर क्लिक कर देख लीजिये कि आपके वेबपेज के लोड होने का समय कितना है फिर कोड लगाने के बाद ये प्रक्रिया दोहराइए और फर्क देख लीजिये ।

.... एक प्रेम कहानी ......


हिन्दू लड़की राधा एक मुस्लिम लड़के से प्रेम करती हैं ,, माँ बापने बहुत समझाया की बेटी निबाह नहीं पायेगी ,,पर राधा ने कहा कि"क्या फर्क है हिन्दू मुसलमान में" उसके खून का रंग भी लाल मेरे खून का रंग भी लाल .... घर वालों व् समाज के प्रबल विरोध के बाद भी मुस्लिम लड़के से प्रेम विवाह रचाती है ,,,शादी के बाद सब कुछ बहुतअच्छा चल रहा था
हिन्दू लड़की का नाम भी बदला नहींगया
सास ससुर बहुत अच्छे निकले ..बहुत प्यार करते थे ...ससुराल में सबकी लाड़ली ..... लड़कीके माँ बाप उससे संबंध तोड़ चुके थे ...जब तब राधा अपने माँ बाप को याद करती और खबर भिजवाती थी कि मुस्लिम परिवार में मैं बहुत खुश हूँ कोई दिक्कत नहीं है
फिर राधा के दो बच्चे हुए एक बेटा एक बेटी ...दो प्यारे बच्चों की परवरिश अच्छे से हुई
बेटी बड़ी हुई शादी के लिए लड़का देखने की बात हुई
तो पति और सास ससुर की बात सुन कर सन्न रह गयी
पति और सास ससुर का निर्णय था कि बिटिया की शादी उसकी बुआ के बेटे से तय की जाएगी.....
राधा ने विरोध किया कि बुआ का लड़का भाई होता है ,,पर दो टूक कहा गया वो हिन्दुओं में है मुस्लिम में नहीं
राधा ने बेटी को कहा की बेटी तू विरोध कर इस बात का ,,,तो बेटी बोली माँ फूफी के लड़के जावेद से मैं प्यार करती हूँ
राधा ने एक तमाचा मारा अपनी बेटी के मुंहपर और बोली,,,,नालायक वो तेरा भाई है तेरी बुआ का बेटा है,,,,बिटिया बोली वो आपके हिन्दू धर्म में होता है और मैं मुस्लिम हूँ
अब राधा के पैरों के नीचे की ज़मीन निकल चुकी थी ,,,बाप की बात याद आई बेटा निबाह नहीं पायेगी .....
उसी रात में राधा ने आत्म ह्त्या कर ली
क्यूंकि नमाज पढ़ना कबूल था,,बुर्का कबूल था ,,ईद .. रमजान कबूल था
पर अपनी बेटी की शादी उसकी बुआ के लड़के से कबूल नहीं कर पायी
बाप की बात आखिरी पल में भी याद आ रही थी कि बेटी खून का रंग सबका एकहोता है पर सोच अलग होती है तू निबाह नहीं पायेगी.........

Saturday, 27 July 2013

बुरी लत्त

एक बार की बात है . एक व्यक्ति को रोज़-रोज़ जुआ खेलने की बुरी आदत पड़ गयी थी . उसकी इस आदत से सभी बड़े परेशान रहते. लोग उसे समझाने कि भी बहुत कोशिश करते कि वो ये गन्दी आदत छोड़ दे , लेकिन वो हर किसी को एक ही जवाब देता, " मैंने ये आदत नहीं पकड़ी, इस आदत ने मुझे पकड़ रखा है !!!"

और सचमुच वो इस आदत को छोड़ना चाहता था , पर हज़ार कोशिशों के बावजूद वो ऐसा नहीं कर पा रहा था.

परिवार वालों ने सोचा कि शायद शादी करवा देने से वो ये आदत छोड़ दे , सो उसकी शादी करा दी गयी. पर कुछ दिनों तक सब ठीक चला और फिर से वह जुआ खेलने जाना लगा. उसकी पत्नी भी अब काफी चिंतित रहने लगी , और उसने निश्चय किया कि वह किसी न किसी तरह अपने पति की इस आदत को छुड़वा कर ही दम लेगी.

एक दिन पत्नी को किसी सिद्ध साधु-महात्मा के बारे में पता चला, और वो अपने पति को लेकर उनके आश्रम पहुंची. साधु ने कहा, " बताओ पुत्री तुम्हारी क्या समस्या है ?"

पत्नी ने दुखपूर्वक सारी बातें साधु-महाराज को बता दी .

साधु-महाराज उनकी बातें सुनकर समस्या कि जड़ समझ चुके थे, और समाधान देने के लिए उन्होंने पति-पत्नी को अगले दिन आने के लिए कहा .

अगले दिन वे आश्रम पहुंचे तो उन्होंने देखा कि साधु-महाराज एक पेड़ को पकड़ के खड़े है .

उन्होंने साधु से पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं ; और पेड़ को इस तरह क्यों पकडे हुए हैं ?

साधु ने कहा , " आप लोग जाइये और कल आइयेगा ."

फिर तीसरे दिन भी पति-पत्नी पहुंचे तो देखा कि फिर से साधु पेड़ पकड़ के खड़े हैं .

उन्होंने जिज्ञासा वश पूछा , " महाराज आप ये क्या कर रहे हैं ?"

साधु बोले, " पेड़ मुझे छोड़ नहीं रहा है .आप लोग कल आना ."

पति-पत्नी को साधु जी का व्यवहार कुछ विचित्र लगा , पर वे बिना कुछ कहे वापस लौट गए.

अगले दिन जब वे फिर आये तो देखा कि साधु महाराज अभी भी उसी पेड़ को पकडे खड़े है.

पति परेशान होते हुए बोला ," बाबा आप ये क्या कर रहे हैं ?, आप इस पेड़ को छोड़ क्यों नहीं देते?"

साधु बोले ,"मैं क्या करूँ बालक ये पेड़ मुझे छोड़ ही नहीं रहा है ?"

पति हँसते हुए बोला , "महाराज आप पेड़ को पकडे हुए हैं , पेड़ आप को नहीं !….आप जब चाहें उसे छोड़ सकते हैं."

साधू-महाराज गंभीर होते हुए बोले, " इतने दिनों से मै तुम्हे क्या समझाने कि कोशिश कर रहा हूँ .यही न कि तुम जुआ खेलने की आदत को पकडे हुए हो ये आदत तुम्हे नहीं पकडे हुए है!"

पति को अपनी गलती का अहसास हो चुका था  , वह समझ गया कि किसी भी आदत के लिए वह खुद जिम्मेदार है ,और वह अपनी इच्छा शक्ति के बल पर जब चाहे उसे छोड़ सकता है.

Friday, 26 July 2013

बड़ा काम छोटा काम


Hindi Story With a Message

बड़ा काम छोटा काम!

शहर की मेन मार्केट में  एक  गराज  था  जिसे  अब्दुल  नाम  का  मैकेनिक चलाता  था . वैसे  तो  अब्दुल  एक अच्छा आदमी  था  लेकिन  उसके  अन्दर  एक  कमी  थी , वो  अपने  काम  को  बड़ा  और दूसरों  के  काम  को  छोटा  समझता  था .

एक  बार  एक  हार्ट  सर्जन  अपनी  लक्ज़री कार लेकर  उसके  यहाँ  सर्विसिंग  कराने  पहुंचे . बातों -बातों  में  जब  अब्दुल  को  पता  चला  की  कस्टमर  एक  हार्ट  सर्जन  है  तो  उसने  तुरन्त  पूछा , "  डॉक्टर साहब  मैं  ये  सोच रहा  था  की  हम  दोनों  के  काम एक  जैसे  हैं… !"

"एक  जैसे  ! वो  कैसे ?" , सर्जन  ने थोडा अचरज से पूछा .

"देखिये  जनाब ," अब्दुल कार  के कौम्प्लिकेटेड इंजन  पर  काम  करते  हुए  बोल , " ये  इंजन  कार  का  दिल  है  , मैं  चेक  करता  हूँ  की  ये  कैसा  चल  रहा  है  , मैं  इसे  खोलता  हूँ  , इसके  वाल्वस फिट करता  हूँ , अच्छी तरह  से  सर्विसिंग  कर  के  इसकी प्रोब्लम्स ख़तम  करता  हूँ  और  फिर  वापस  जोड़  देता  हूँ …आप  भी  कुछ  ऐसा  ही  करते  हैं  ; क्यों  ?"

"हम्म ", सर्जन  ने  हामी  भरी .

"तो  ये  बताइए  की  आपको  मुझसे  10 गुना  अधिक  पैसे  क्यों  मिलते  हैं, काम तो आप भी मेरे जैसा ही करते हैं ?", अब्दुल  ने  खीजते  हुए पूछा .

सर्जन  ने  एक क्षण सोचा  और  मुस्कुराते  हुए बोला  , " जो  तुम  कर  रहे  हो  उसे चालू इंजन  पे  कर के  देखो  , समझ  जाओगे ."

अब्दुल को इससे पहले किसी ने ऐसा जवाब नही दिया था, अब वह अपनी गलती समझ चुका था.

Friends, हर एक  काम की  अपनी  importance होती  है , अपने  काम  को  बड़ा समझना ठीक  है  पर  दूसरों  के  काम  को  कभी  छोटा  नहीं  समझना  चाहिए  ; हम  औरों  के  काम  के  बारे  में  बस उपरी तौर पे  जानते  हैं  लेकिन  उसे  करने  में  आने  वाले  challenges के  बारे  में  हमें  कुछ  ख़ास  नहीं  पता  होता . इसलिए  किसी  के  काम  को  छोटा  नहीं  समझें  और  सभी  की  respect करें

Wednesday, 17 July 2013

परोपकार की भावना


पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक 
पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र में 
लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने 
से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था 
कि इसे किस-किस को दे। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी- खासी 
थी, 

पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके। 
राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। 
तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह 
मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण 
उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। 

राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई 
तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी। राजा ने 
मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, 'इस 
सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह 
केवल 2 आंखों के लिए है।' मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। 
उसकी रोशनी आ गई। 

उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा। फिर 
उसने बचा-खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया। 
यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, 'यह आपने क्या किया?अब 

तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।' 
मंत्री ने जवाब दिया, 'राजन, चिंता न करें। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं 
आंख वाला बनकर 
हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंग मैंने चखकर यह जान लिया है 
कि सुरमा किस चीज से बना है। मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर 
नेत्रहीनों को बांटूंगा। 

' राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, 'यह 
हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य 
के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।' —